Tuesday, October 5, 2010

हम भी वापस जाएँगे

हम भी वापस जाएँगे

आबादी से दूर,
घने सन्नाटे में,
निर्जन वन के पीछे वाली,
ऊँची एक पहाड़ी पर,
एक सुनहरी सी गौरैया,
अपने पंखों को फैलाकर,
गुमसुम बैठी सोच रही थी,
कल फिर मैं उड़ जाऊँगी,
पार करूँगी इस जंगल को.
वहाँ दूर जो महके जल की,
शीतल एक तलैया है,
उसका थोड़ा पानी पीकर,
पश्चिम को मुड़ जाऊँगी,
फिर वापस ना आऊँगी,
लेकिन पर्वत यहीं रहेगा,
मेरे सारे संगी साथी,
पत्ते शाखें और गिलहरी,
मिट्टी की यह सोंधी खुशबू,
छोड़ जाऊँगी अपने पीछे ....,
क्यों न इस ऊँचे पर्वत को,
अपने साथ उड़ा ले जाऊँ।

और चोंच में मिट्टी भरकर,
थोड़ी दूर उड़ी फिर वापस,
आ टीले पर बैठ गई .....।
हम भी उड़ने की चाहत में,
कितना कुछ तज आए हैं,
यादों की मिट्टी से आखिर,
कब तक दिल बहलाएँगे,
वह दिन आएगा जब वापस,
फिर पर्वत को जाएँगे,
आबादी से दूर,
घने सन्नाटे में।

आज बरसों बाद

आज बरसों बाद
जैसे अपने शहर में लौटा हूँ,
गली के सूखे पेड़ पर नई कोंपल को फूटे देखा,
सन्ध्या के हाथों को फिर से रवि को छूते देखा,
धड कन में तेजी पाता हूँ जैसे,
आज बरसों बाद ।
आज बरसों बाद
जैसे पत्तों की रूकी हुई साँस,
सर्र र से उच्छवास बन कर निकल रही है,
जल तल पर फिर से चाँदनी फिसल रही है,
नयनों में जल पाता हूँ जैसे,
आज बरसों बाद ।
आज बरसों बाद,
जैसे चाँद की धुदंली आँख को
बरखा ने अपनी फुहारों से धो डाला है,
मेरी खिड की से फिर झाँक रहा उजाला है,
पवनों में रूनझुन पाता हूँ जैसे,
आज बरसों बाद ।

आज बरसों बाद,
जैसे सैनिक युद्ध से लौटा है,
पीपल तले झूल रही सुहागिन सावन का झूला,
लहराते केशों को देख घन भी बरसना भूला,
दिल में बारूद सा पाता हूँ जैसे,
आज बरसों बाद ।

गुनगुनी होने लगी है


गुनगुनी
होने लगी है
दपदपाती धूप अब तो
क्वाँर की दहलीज पर
धर पाँव!

नवविवाहित
युगल - जैसी
मुदित है हर भोर अब तो
हो रहा मधुमास
पूरा गाँव!

है बुलाती
पास अपने
सरसती वातासि अब तो
धानवाले खेत नंगे पाँव!

सोच
परदेसी पिया का
गाल पर धर हाथ अब तो
करे सजनी बैठ
पीपल छाँव!

झूठ-से
लगते उसे हैं
सगुन के सब काज अब तो
झूठ-सी ही भोर की
अब काँव!